जामिया बदरुल उलूम

सन 1857 ई0 से पहले हिन्दुस्तान में षिक्षा और धार्मिक तरबियत हासिल करने के लिये बडे बडे मदारिस, खानकाहे और प्राईवेट मराकिज थे। जहां दर्स व तदरीस और इस्लाही तरबियत का सिलसिला कायम था। मगर अफसोस के सन 1857 ई0 के बाद ये सिलसिला कायम ना रह सका, इतिहास हमें बताता है के 1857 ई0 में जब आजादी की लहर को कुचल कर पूरे मुल्क पर बरतानवी साम्राज्य काबिज हो गया और चुन चुन कर उलामा को फाँसी पर लटकाया गया और मदारिस व दीनी मराकिज खत्म कर दिये गये, तो उस दौर के मुस्लिम दानिश्वरों और उलामा ए किराम ने हिन्दुस्तान में देष की आजादी, मिल्लत ए इस्लामिया ए हिन्द की सर बुलन्दी और इस्लाम और मुसलमानो के तहफफुज के लिये मदारिसे इस्लामिया और दीनी मकातिब कायम करने की मुहिम चलायी । सब से पहले इस तहरीक का हेडक्वार्टर दारुल उलूम देवबन्द कायम फरमाया और इस के अलावा अपनी लगातार कोषिष से देष के कोने कोने में धार्मिक व षिक्षा के मराकिज कायम किये, और देखते ही देखते पूरे देष में मदारिस व मकातिब की षाखाएं बिछ गयी ।
फिर ऐसा ही नाजुक समय हिन्दुस्तान में सन 1947 ई0 के बाद आया। उस दौर के हमारे अकाबिर ने इस अहम और शदीद जरुरत को महसूस किया और करोडो मुसलमान बच्चों व बच्चियोें की दीनी तालीम व तरबियत के लिए कोषिष शुरु कर दी। इस कोशिश के नतीजे में भी सेंकडों मदारिस और दीनी मकातिब कायम हुए।
इसी मुबारक और मुस्तहकम सिलसिले की एक जरुरी और मजबूत कडी जामिया बदरुल उलूम, गढी दौलत, काँधला है। जो इलाके के अवाम व खवास की कठिन मेहनत और कोषिष के नतीजे में, आधी सदी पहले 14 जिलहिज्जा 1382 हिजरी मुताबिक मई 1962 ईस्वी को अकाबिर ए दारुल उलूम देवबन्द के हाथो कायम हुआ।मदरसे के शुरुआती दौर में बहुत से हजरात मदरसे के इन्तजाम के लिए तशरीफ लाए । मगर हक तआला ने मदरसे की ताअलीमी व ताअमीरी तरक्की के लिए वली कामिल नमूना ए अस्लाफ हजरत अल्हाज मौलाना मुहम्मद कामिल साहब रहमातुल्लाह अलैह काँधलवी का इंतिखाब किया था।
मौलाना मौसूफ शेखुल अरब वल अजम हजरत मौलाना सय्यद हुसैन अहमद साहब मदनी नव्वरल्लाहु मरकदहू के आशिक ए जार, शार्गिद ए रशीद व खादिम ए खास और फिदा ए मिल्लत अमिरुल हिन्द हजरत मौलाना सय्यद असअद साहब मदनी कुददिसासिररुहु के मुम्ताज खलीफा, एक साहिबे इरशाद बुजुर्ग थे। हजरत के इन्तिकाल के बाद से हजरत के बडे साहबजादे व जानषीन हजरत मौलाना मुहम्मद आकिल साहब जामिया के मोहतमिम व मुन्तजिम की हैसियत से मदरसे की खिदमत अन्जाम देकर हजरत वाला के मिषन को निहायत उमदगी से आगे बढा रहे है।
मदरसा हाजा तालीमी और तामीरी हर ऐतबार से अब एक बडे जामिया की शक्ल ले चुका है। हजरत कांधलवी के इन्तिजाम संभालने के बाद से आज तक जामिया हाजा ने जो इल्मी, दीनी फिक्री, इस्लाही और तरबियती खिदमात अन्जाम दी है। वो अपनी मिसाल आप है।
जामिया हाजा का निजाम तालीम व तरबीयत अपनी हमउम्र दर्सगाहों में एक इम्तियाजी शान रखता है। जामिया हाजा में हिफ्ज व नाजरा, कुरआन ए पाक, तजवीद व किरात हिन्दी, अंग्रेजी और फारसी के अलावा अरबी अव्वल से दौरा ए हदीस शरीफ तक निहायत ठोस और मैयारी तालीम का नज्म है। दौरा ए हदीस शरीफ शव्वाल सन 1431 हिजरी में शुरु किया गया था। जो अल्हमदुलिल्लाह पूरी कामयाबी के साथ हदीस की नषर व इशाअत का जरिया बना हुआ है। पिछले चार सालो मे 80 से ज्यादा तलबा दोरा ए हदीस शरीफ से फरागत पाकर जामिया हाजा से सनद ए फजीलत हासिल करके देष के अलग अलग प्रदेषों में उलूमे इस्लामिया की खिदमत व इषाअत में मसरुफ है । फिदा ए मिल्लत अमीरुल हिन्द हजरत मौलाना सय्यद असअद साहब मदनी नव्वरल्लाहु मरकदहु के फैजे बातिनी और हजरत अक्दस अल्हाज मौलाना मुहम्मद कामिल साहब रहमतुल्लाह अलैह साबिक मोहतमिम जामिया हाजा की दुआओं और लगातार कोषिषों का नतीजा है, कि अलहम्दुलिल्लाह जामिया हाजा रात दिन तालीमी व तामीरी और तरबियती हर लिहाज से तरक्की की मंजिलंे तय करते हुए एक तनावर दरख्त की षक्ल में अवाम व खवास को फायदा पहुँचा रहा है। जामिया की उम्दा मैयारी तालीमी तरबियती और दीनी खिदमात का असर है कि जामिया की षोहरत विदेषो तक पहुँच चुकी है।
अल्लाह तआला जामिया हाजा की हर तरह के षुरुर व फितने से हिफाजत फरमाये, और दिन दुगनी रात चोगुनी तरक्कीयात से नवाजे और जामिया की मदद करने वाले और मुहब्बत व ताल्लुक रखने वालों को दीनी और दुनियावी हर तरह के फायदे से माला माल फरमायें। आमीन


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